Wednesday, April 29, 2015

वो कच्चे मकान ही अच्छे थे...









वो कच्चे मकान ही अच्छे थे
जहां दरवाजे छोटे और लोग बड़े थे
सर झुकाकर चलते थे
बुजुर्गों का अदब करते थे
अब मकान बहुमंजिला हो गए
दरवाजे बड़े और लोग छोटे हो गए...
....अमित

Monday, April 27, 2015

मंजिले कई और भी है...

ख्वाहिशें अभी और भी है

उम्मीदें कई और भी है

आराम का वक्त नहीं राह में 

मंजिलें कई और भी है                         

                            ...अमित