skip to main
|
skip to sidebar
इंतजार अभी और भी है...
Wednesday, April 29, 2015
वो कच्चे मकान ही अच्छे थे...
वो कच्चे मकान ही अच्छे थे
जहां दरवाजे छोटे और लोग बड़े थे
सर झुकाकर चलते थे
बुजुर्गों का अदब करते थे
अब मकान बहुमंजिला हो गए
दरवाजे बड़े और लोग छोटे हो गए...
....अमित
Monday, April 27, 2015
मंजिले कई और भी है...
ख्वाहिशें अभी और भी है
उम्मीदें कई और भी है
आराम का वक्त नहीं राह में
मंजिलें
कई और भी है
...अमित
Sunday, April 26, 2015
अब वापस आकर भी वो कुछ नहीं पाएगा...
वो चाहतों के मंजिल की साहिरा निकली...
मेरा सतपुड़ा अच्छा है...
तुमसे अच्छी तो ओस की बूंदें है...
उम्मीदों के चाक पर गढ़ना था तुम्हें...
नदी के किनारे से बन गई हो तुम...
Newer Posts
Home
Subscribe to:
Comments (Atom)
Followers
Blog Archive
►
2020
(1)
►
April
(1)
►
2019
(2)
►
March
(2)
►
2017
(6)
►
September
(4)
►
April
(1)
►
January
(1)
►
2016
(27)
►
December
(1)
►
November
(3)
►
October
(8)
►
July
(1)
►
June
(2)
►
April
(6)
►
February
(1)
►
January
(5)
▼
2015
(28)
►
December
(1)
►
November
(3)
►
October
(3)
►
September
(3)
►
August
(4)
►
July
(2)
►
June
(1)
►
May
(3)
▼
April
(8)
वो कच्चे मकान ही अच्छे थे...
मंजिले कई और भी है...
अब वापस आकर भी वो कुछ नहीं पाएगा...
वो चाहतों के मंजिल की साहिरा निकली...
मेरा सतपुड़ा अच्छा है...
तुमसे अच्छी तो ओस की बूंदें है...
उम्मीदों के चाक पर गढ़ना था तुम्हें...
नदी के किनारे से बन गई हो तुम...
इंतजार अभी और भी है...
Amit Bhatore
View my complete profile