खामोश है खरगोन। सबकी सेहत के लिए। सुरक्षा के लिए। सम्मान के लिए। संस्कृति के लिए। सभी के लिए। एक एक गली, मोहल्ला, चौराहा सूना है। सड़कों पर सन्नटा है। जहां वाहनों की रेलमपेल लगी रहती थी वहां अजीब सी आहट है। सुबह से देर रात तक शहर जैसे नींद की अगोश में है। सोमवार की शुरुआत से शनिवार के दबाव तक हर दिन बीत रहे हैं जैसे तैसे। तीज, त्यौहार, जयंती, उत्सव सादगी से गुजर रहे हैं। शहर के मिजाज को आलस ने घेर लिया है। शहर के हालात बदले बदले हैं लेकिन भूगोल नहीं बदला।
कुछ माह पहले जहां नवग्रह मेला लगा था वह मैदान वीरान है। कई गुरुवार से यहां साप्ताहिक हाट भी नहीं लगा। नवग्रह मंदिर के बाहर कुछ भिक्षुक आराम कर रहे हैं। एक अधेड़ गीत गुनगुना रहा है। वह भोजन बांटने वाले वाहन के इंतजार में हैं। मैदान पर बच्चे मैले कुचैले कपड़ों में खेल रहे हैं। कोरोना से बेखबर। अपनी मस्ती में बस दौड़ रहे हैं एक दूसरे के पीछे। आनंद और उत्साह के साथ। आगे बढ़ने पर कुंदा पुल सीना ताने खड़ा है। बहुत दिनों से थरथराया भी नहीं। पहले एक दो ट्रकों के साथ गुजरने से थरथराता था। पुल के गड्ढे और रेलिंग एक दूसरे से घंटों बातें करते रहते हैं। ऊब जाने पर पास में बन रहे अधूरे पुल से पूछते हैं, मानसून तक तुम्हारा कुंदा के किनारे जोड़ पाना मुश्किल है। लेकिन हम भी तैयार हैं बाढ़ के पानी से टकराने के लिए। दशकों तक साथ निभाया। इस बार भी निभाएंगे। जब तक पानी ऊपर से न गुजरे सभी को पार पहुंचाएंगे। शेष अगले भाग में।
...अमित
