Saturday, October 31, 2015

कुछ देर सिकंदर हो जाए...

नई पुरानी यादों को भूल कलंदर हो जाए
नदियों के साथ बहकर अब समंदर हो जाए

सवाल है कई जो जवाब ढूंढ्ते फिर रहे
दफन कर दो इससे पहले की बवंडर हो जाए

आँखें बंद करके फिर नया ख्वाब सजा लो
नींद में ही सही कुछ देर सिकंदर हो जाए

इंतजाम कर के रखो सल्तनत बचाने का
ऐसा न हो की दुश्मन किले के अंदर हो जाए

ख्वाहिशों के गुलदानों को फिर सजाओ अमित
नादानियों से फिर गुलिस्ता न बंजर हो जाए

...अमित

Thursday, October 1, 2015

फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई...


अँधेरी गलियों में तन्हा चलते रहे बेइंतहा
मिला साथ मंजिल नजर आने लग गई

गुमनाम भटकते रहे बरसों बरस जो खत
डाकिये को उम्मीदें पता बताने लग गई

थपेड़ों से बार बार लड़ती रही पतवार
कश्ती को किनारे हवा लगाने लग गई

सर्द रातों में ठिठुरते बदलते रहे करवटें
तेरे एहसासों की पश्मीना सुलाने लग गई

बहार लाने बंजर जमीं पर बहाया पसीना
जमकर हुई बारिश फूल खिलाने लग गई

कई बाजी हारकर भी नहीं हारी हिम्मत
नई कोशिशें खिताब जिताने लग गई

कोरे कागजों में लिखते रहे प्यार अमित
फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई

...अमित

सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले...

जुगनुओं को देख उड़ने का हौसला भर ले
अंधेरों में ही सही तू लो की बातें कर ले

तपती रेत में बढ़ता चल पैरों छाले न देख
ऊँटों की तरह सेहरा से मुलाकातें कर ले

आसमान को देख आशाओं से जी भरके
चाँद सितारों के साथ ख़ुशी रातें कर ले

पतझड़ में पहाड़-नदियों की आस बंधने दे
सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले

जो नहीं मिला वो जरूर मिल जायेगा अमित
अभी जो है उन्ही के साथ सौगातें कर ले

...अमित