Saturday, October 31, 2015

कुछ देर सिकंदर हो जाए...

नई पुरानी यादों को भूल कलंदर हो जाए
नदियों के साथ बहकर अब समंदर हो जाए

सवाल है कई जो जवाब ढूंढ्ते फिर रहे
दफन कर दो इससे पहले की बवंडर हो जाए

आँखें बंद करके फिर नया ख्वाब सजा लो
नींद में ही सही कुछ देर सिकंदर हो जाए

इंतजाम कर के रखो सल्तनत बचाने का
ऐसा न हो की दुश्मन किले के अंदर हो जाए

ख्वाहिशों के गुलदानों को फिर सजाओ अमित
नादानियों से फिर गुलिस्ता न बंजर हो जाए

...अमित

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