जो साथ न आया उसका भी गम है
उजालों के इंतजार में आँखें नम है
उजालों के इंतजार में आँखें नम है
दिल के दायरे में समाती नहीं ख्वाहिशें
ख़्वाब तो बहुत है मगर रातें कम है
दौराहों पर आकर सिमटती है मंजिलें
लड़खड़ाकर ही क्यों संभलते कदम है
मिलने से रोकने की करते रहे कोशिशें
सहारे के नाम पर आकर ढहाते सितम है
चेहरे को देखकर मिलाते नहीं नजरें
आइनों को देखकर वो संवारतें भरम है
...अमित
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