Sunday, September 20, 2015

बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है...

बहाकर नदियों को समंदर से मिला दो
बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है
लहलहायेगी फसलें जरूर इस बार
बीजों को बारिश से आशा बहुत है
बादलों को देखकर मदमस्त है मोर
बूंदों के एहसास का प्यासा बहुत है
टूटकर बिखरकर ले रहे आकर
चोटों ने पत्थर को तराशा बहुत है
आईने बदलते नहीं चेहरे की रंगत
खुद को देखने की परिभाषा बहुत है
संवेदनाओं को बहने से कैसे रोके
मदद के नाम पर तमाशा बहुत है
तुमसे मिलकर और क्या बोले अमित
आँखों से आँखों की भाषा बहुत है
...अमित

Sunday, September 6, 2015

फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई...



अँधेरी गलियों में तन्हा चलते रहे बेइंतहा
मिला साथ मंजिल नजर आने लग गई


गुमनाम भटकते रहे बरसों बरस जो खत
डाकिये को उम्मीदें पता बताने लग गई


थपेड़ों से बार बार लड़ती रही पतवार
कश्ती को किनारे हवा लगाने लग गई


सर्द रातों में ठिठुरते बदलते रहे करवटें
तेरे एहसासों की पश्मीना सुलाने लग गई


बहार लाने बंजर जमीं पर बहाया पसीना
जमकर हुई बारिश फूल खिलाने लग गई


कई बाजी हारकर भी नहीं हारी हिम्मत
नई कोशिशें खिताब जिताने लग गई


कोरे कागजों में लिखते रहे प्यार अमित
फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई

...अमित

Tuesday, September 1, 2015

सोशल मीडिया पर इनके भाव देखिये

प्याज में तुल रहे रिश्ते आज देखिये
सोशल मीडिया पर इनके भाव देखिये
फर्जी आईडी बनाकर करते है चैट
युवाओं में संस्कारों का भटकाव देखिये
दुर्भावना में करते है कमेंट और पोस्ट
उन्माद के लिए अधर्मियों के दांव देखिये
स्टेटस बदलकर ले रहे मौसम का मजा
एंटीसोशलवाद का बढ़ता घाव देखिये
आइनों की सच्चाई को झुठला रहे अमित
फ़ोटो को एडिट कर मूछों के ताव देखिये