Sunday, September 6, 2015

फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई...



अँधेरी गलियों में तन्हा चलते रहे बेइंतहा
मिला साथ मंजिल नजर आने लग गई


गुमनाम भटकते रहे बरसों बरस जो खत
डाकिये को उम्मीदें पता बताने लग गई


थपेड़ों से बार बार लड़ती रही पतवार
कश्ती को किनारे हवा लगाने लग गई


सर्द रातों में ठिठुरते बदलते रहे करवटें
तेरे एहसासों की पश्मीना सुलाने लग गई


बहार लाने बंजर जमीं पर बहाया पसीना
जमकर हुई बारिश फूल खिलाने लग गई


कई बाजी हारकर भी नहीं हारी हिम्मत
नई कोशिशें खिताब जिताने लग गई


कोरे कागजों में लिखते रहे प्यार अमित
फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई

...अमित

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