बहाकर नदियों को समंदर से मिला दो
बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है
बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है
लहलहायेगी फसलें जरूर इस बार
बीजों को बारिश से आशा बहुत है
बीजों को बारिश से आशा बहुत है
बादलों को देखकर मदमस्त है मोर
बूंदों के एहसास का प्यासा बहुत है
बूंदों के एहसास का प्यासा बहुत है
टूटकर बिखरकर ले रहे आकर
चोटों ने पत्थर को तराशा बहुत है
चोटों ने पत्थर को तराशा बहुत है
आईने बदलते नहीं चेहरे की रंगत
खुद को देखने की परिभाषा बहुत है
खुद को देखने की परिभाषा बहुत है
संवेदनाओं को बहने से कैसे रोके
मदद के नाम पर तमाशा बहुत है
मदद के नाम पर तमाशा बहुत है
तुमसे मिलकर और क्या बोले अमित
आँखों से आँखों की भाषा बहुत है
आँखों से आँखों की भाषा बहुत है
...अमित
No comments:
Post a Comment