Wednesday, November 25, 2015

आज फिर दामन में वो दीपक सिराने आ गए






























थम चुकी खामोश लहरों को हिलाने आ गए
आज फिर दामन में वो दीपक सिराने आ गए
देखकर अंजान बन मिलने से जो बचते रहे
मशहूर होते ही वो अब रिश्ते निभाने आ गए
चार दिन बनते रहे जो शौकतों में रहनुमा
ख़त्म जब दौलत हुई तो दिन ठिकाने आ गए
सुबह से शाम तक यादों में वो आते रहे
रातों में भी अब वो ख्वाबों के बहाने आ गए
काम करके देर तक जब लौट आए घर तलक
बाजार में बनकर खबर फिर आजमाने आ गए
...अमित

Friday, November 13, 2015

कुछ पल साथ बिताओ भी...

कभी भूले भटके आओ भी
कुछ पल साथ बिताओ भी

व्यस्तता से समय निकालो
दिल से रिश्ते निभाओ भी

मन निर्बल हो जब रातों में
कुछ अपने दर्द दिखाओ भी

नादानी में सब खो न देना
कभी पाने में वक्त लगाओ भी

औरों को हँसना सिखलाते
कभी खुद का मन बहलाओ भी

...अमित

Sunday, November 8, 2015

उजालों के इंतजार में आँखें नम है...

जो साथ न आया उसका भी गम है
उजालों के इंतजार में आँखें नम है
दिल के दायरे में समाती नहीं ख्वाहिशें
ख़्वाब तो बहुत है मगर रातें कम है
दौराहों पर आकर सिमटती है मंजिलें
लड़खड़ाकर ही क्यों संभलते कदम है
मिलने से रोकने की करते रहे कोशिशें
सहारे के नाम पर आकर ढहाते सितम है
चेहरे को देखकर मिलाते नहीं नजरें
आइनों को देखकर वो संवारतें भरम है
...अमित