कौन सुनेगा मेरी उलझन हर कोई अपनी हाक रहा
आँखों में आंसू लेकर मैं नीलमेघ को ताक रहा
आशंकाएं होंगी निश्चित, पथ भी होंगे पथरीले
अमृत कैसे पाएंगे जब मन ही होंगे जहरीले
सुख दुःख के परिणामों को क्यों भारी मन से आक रहा
कौन सुनेगा अपनी उलझन हर कोई अपनी हाक रहा
जीत हार के डर से कब तक मन ही मन घबराएंगे
आशाओं का बोझ उठाए कब तक हम कतराएंगे
व्यर्थ की चिंताएं लेकर क्यों अंतर मन में झांक रहा
कौन सुनेगा अपनी उलझन हर कोई अपनी हाक रहा...अमित
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