Wednesday, April 22, 2020

लॉक डाउन डायरी, खामोश है खरगोन (भाग :1)

खामोश है खरगोन। सबकी सेहत के लिए। सुरक्षा के लिए। सम्मान के लिए। संस्कृति के लिए। सभी के लिए। एक एक गली, मोहल्ला, चौराहा सूना है। सड़कों पर सन्नटा है। जहां वाहनों की रेलमपेल लगी रहती थी वहां अजीब सी आहट है। सुबह से देर रात तक शहर जैसे नींद की अगोश में है। सोमवार की शुरुआत से शनिवार के दबाव तक हर दिन बीत रहे हैं जैसे तैसे। तीज, त्यौहार, जयंती, उत्सव सादगी से गुजर रहे हैं। शहर के मिजाज को आलस ने घेर लिया है। शहर के हालात बदले बदले हैं लेकिन भूगोल नहीं बदला।
कुछ माह पहले जहां नवग्रह मेला लगा था वह मैदान वीरान है। कई गुरुवार से यहां साप्ताहिक हाट भी नहीं लगा। नवग्रह मंदिर के बाहर कुछ भिक्षुक आराम कर रहे हैं। एक अधेड़ गीत गुनगुना रहा है। वह भोजन बांटने वाले वाहन के इंतजार में हैं। मैदान पर बच्चे मैले कुचैले कपड़ों में खेल रहे हैं। कोरोना से बेखबर। अपनी मस्ती में बस दौड़ रहे हैं एक दूसरे के पीछे। आनंद और उत्साह के साथ। आगे बढ़ने पर कुंदा पुल सीना ताने खड़ा है। बहुत दिनों से थरथराया भी नहीं। पहले एक दो ट्रकों के साथ गुजरने से थरथराता था। पुल के गड्ढे और रेलिंग एक दूसरे से घंटों बातें करते रहते हैं। ऊब जाने पर पास में बन रहे अधूरे पुल से पूछते हैं, मानसून तक तुम्हारा कुंदा के किनारे जोड़ पाना मुश्किल है। लेकिन हम भी तैयार हैं बाढ़ के पानी से टकराने के लिए। दशकों तक साथ निभाया। इस बार भी निभाएंगे। जब तक पानी ऊपर से न गुजरे सभी को पार पहुंचाएंगे। शेष अगले भाग में।
...अमित

Wednesday, March 27, 2019

कुछ तो बताओ!

तुम वैसी ही हो ना!
जैसा मैंने महसूस किया,
बातों से,
एहसासों से,
आवाज़ से,
अंदाज़ से,
आईना हो 
या रंगीन शीशा!
कौन हो तुम
कुछ तो बताओ..!

Friday, March 8, 2019

तुम नारी ही हो ना...

जीवन में ताने बाने,
परिवार के इर्द गिर्द
बुनती जाती हो
तुम नारी ही हो ना...
अनसुलझी पहेलियां,
आत्मविश्वास से
हमेशा सुलझाती हो
तुम नारी ही हो ना...
तमाम मुश्किलों में,
तनावमुक्त होकर
हमेशा मुस्कुराती हो
तुम नारी ही हो ना...
सबकी परवाह कर,
रूठने पर भी
स्नेह जताती हो
तुम नारी ही हो ना...
मां, बहन, बेटी, बहू,
अपनाकर रस्में
रिश्ते निभाती हो
तुम नारी ही हो ना...
स्नेहसिक्त स्वर में,
लय ताल के साथ
गीत गुनगुनाती हो
तुम नारी ही हो ना...
प्रेम से सींचकर,
सुंदर फूलों की
पौध उगाती हो
तुम नारी ही हो ना...
घर आंगन को,
अपनत्व के साथ
स्वर्ग बनाती हो
हां, तुम नारी ही हो...
...अमित

Monday, September 18, 2017

बारिश, आखिर जीत ही गई

बारिश, आखिर जीत ही गई
मुझे भिगोकर कुछ देर
लौट गई लेकर
उम्मीदें, ख्वाहिशें और ख्वाब
और भी बहुत कुछ
लेकिन नहीं ले जा पाई
एहसास, अंतरमन की प्यास
अबकी बार जरूर आना
भीगेंगे जी भरकर
भूलकर सब कुछ
दे जाना अगर दे सको तो
सब्र, सुकूँ, खुशी और हँसी

...अमित

दो नयन फिर सजल हो जाएंगे

दो नयन फिर सजल हो जाएंगे
आखरों से मिल ग़ज़ल हो जाएंगे

खंडहर बनकर जो जर्जर हो रहे
तुमसे मिलते ही महल हो जाएंगे

लफ्ज जो अधरों से न निकले कभी
एहसास पाकर वो कंवल हो जाएंगे

कत्ल करने ख्वाहिशों का आएंगे
साथ पाकर वो फजल हो जाएंगे

आज ही संभाल कर रख लो मुझे
भूल जाओगे गर जो कल हो जाएंगे

...अमित

डूब जाएगा घर आँगन सब

उम्मीदों की न बारिश होगी, खेत न अबके लहराएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब जलराशि में बह जाएंगे

डूबेगा हर गली मोहल्ला, जिसमें बीता था बचपन
छत बचेगी और न ताखा, जिसमें रखते थे दरपन
बरगद पर सावन के झूले अबके नहीं नजर आएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...

चौपालें सूनी सी होगी, नहीं दिखाई देंगे मेले
हँसी ठिठोली जहां होती थीे, बच्चों के खो गए रेले
पेड़ की छांव वाले आँगन में अबके, लोरी कैसे सुनाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...

खुशियां लेकर जन्मी बिटिया, परणी जब आंखें भर आई
जिस आँगन में मंडप बांधा, दरवाजे पर बजी शहनाई
ब्याही बेटी के जैसे, घर वापस लौट न पाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...

दिया सा रात भर जलता रहा है

दिया सा रात भर जलता रहा है
पतंगों की तरह मचलता रहा है

ख्वाहिशें अधूरी अधूरी सी रही
ख़्वाब आंखों में पलता रहा है

हाथों में अब कुछ भी नहीं
समय रेत सा निकलता रहा है

पथरीली राह से पगडंडियों तक
बार बार गिरके संभलता रहा है

जमना तो बदनाम करता रहेगा
कीचड़ में कंवल सा खिलता रहा है

✍ अमित