दो नयन फिर सजल हो जाएंगे
आखरों से मिल ग़ज़ल हो जाएंगे
खंडहर बनकर जो जर्जर हो रहे
तुमसे मिलते ही महल हो जाएंगे
लफ्ज जो अधरों से न निकले कभी
एहसास पाकर वो कंवल हो जाएंगे
कत्ल करने ख्वाहिशों का आएंगे
साथ पाकर वो फजल हो जाएंगे
आज ही संभाल कर रख लो मुझे
भूल जाओगे गर जो कल हो जाएंगे
...अमित
आखरों से मिल ग़ज़ल हो जाएंगे
खंडहर बनकर जो जर्जर हो रहे
तुमसे मिलते ही महल हो जाएंगे
लफ्ज जो अधरों से न निकले कभी
एहसास पाकर वो कंवल हो जाएंगे
कत्ल करने ख्वाहिशों का आएंगे
साथ पाकर वो फजल हो जाएंगे
आज ही संभाल कर रख लो मुझे
भूल जाओगे गर जो कल हो जाएंगे
...अमित
No comments:
Post a Comment