दिया सा रात भर जलता रहा है
पतंगों की तरह मचलता रहा है
ख्वाहिशें अधूरी अधूरी सी रही
ख़्वाब आंखों में पलता रहा है
हाथों में अब कुछ भी नहीं
समय रेत सा निकलता रहा है
पथरीली राह से पगडंडियों तक
बार बार गिरके संभलता रहा है
जमना तो बदनाम करता रहेगा
कीचड़ में कंवल सा खिलता रहा है
✍ अमित
पतंगों की तरह मचलता रहा है
ख्वाहिशें अधूरी अधूरी सी रही
ख़्वाब आंखों में पलता रहा है
हाथों में अब कुछ भी नहीं
समय रेत सा निकलता रहा है
पथरीली राह से पगडंडियों तक
बार बार गिरके संभलता रहा है
जमना तो बदनाम करता रहेगा
कीचड़ में कंवल सा खिलता रहा है
✍ अमित
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