Saturday, August 29, 2015

कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब...

कौन हिला पायेगा बुनियाद हमारी
मेहनत के पत्थर जो डाले है साहब
फरेब से सल्तनत बनाई थी जिन्होंने
अब उनकी हवेलियों में ताले है साहब
देश को लूटने की तैयारी में है जालिम
अभी जिन्दा वतन के रखवाले है साहब
सरहदों पर कैसे रुकेंगे दहशत के मंजर
आस्तीन में सांप कई पाले है साहब
कैसे उड़ पाएंगे लंबी उड़ान वो परिंदे
जिनके पंख हवाओं के हवाले है साहब
तितलियों को उड़ने से रोको उस ओर
जिस ओर सियासत के जाले है साहब
कब तक डराएंगे रातों के अंधेरे अमित
कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब
...अमित

Thursday, August 27, 2015

गलतफहमियों के दरियां से उभरता कौन है...

बातों-बातों में वक्त गुजर ही गया
गम के आईनों से धूल हटाता कौन है

हर बार बेइंतहा चाहता रहा एक शख्स
यही जवाब न मिला की बेवफा कौन है

जो हुआ हर बार बस देखते ही रहे
मोड़ से गुजरकर पीछे देखता कौन है

मिटने लगे है तमाम लिखावटों के निशां
तुम्हारें नाम लिखे खतों को खोलता कौन है

तेरे एहसास की बारिश भिगोती रही हरदम
ठंडी पड़ गई आग को जलाता कौन है

हसरतों को पाने में डूबता रहा अमित
गलतफहमियों के दरियां से उभरता कौन है

....अमित

Thursday, August 6, 2015

नीर की आंखों में आकर, अब तो थोड़ा प्यार दो

















नीर की आंखों में आकर, अब तो थोड़ा प्यार दो
निलमेघ का रूप देकर, इनका अंधेरा तार दो
आकाश से प्रवाहित विनाश को विराम दो
बह रही संवेदना, धरा की ओर थोेड़ा ध्यान दो
...अमित

कोई वक्त के साथ बिछड़ता रहा...

वक्त नहीं मिला कभी मुझसेमैं हमेशा उसका इंतजार करता रहाबदलते रहे दिन महिने सालवो मृग मरीचिका सा छलता रहामिलते रहे हारकर तजुर्बें वक्त के साथफिर भी जीत की कामना करता रहाकोई साथ आया वक्त देखकरकोई वक्त के साथ बिछड़ता रहावक्त नहीं मिला कभी मुझसेमैं हमेशा उसका इंतजार करता रहा...अमित