Saturday, August 29, 2015

कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब...

कौन हिला पायेगा बुनियाद हमारी
मेहनत के पत्थर जो डाले है साहब
फरेब से सल्तनत बनाई थी जिन्होंने
अब उनकी हवेलियों में ताले है साहब
देश को लूटने की तैयारी में है जालिम
अभी जिन्दा वतन के रखवाले है साहब
सरहदों पर कैसे रुकेंगे दहशत के मंजर
आस्तीन में सांप कई पाले है साहब
कैसे उड़ पाएंगे लंबी उड़ान वो परिंदे
जिनके पंख हवाओं के हवाले है साहब
तितलियों को उड़ने से रोको उस ओर
जिस ओर सियासत के जाले है साहब
कब तक डराएंगे रातों के अंधेरे अमित
कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब
...अमित

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