Sunday, October 9, 2016

संस्कारों का गान तुम्ही हो, माँ रेवा...

संस्कारों का गान तुम्ही हो, माँ रेवा
जन जन का अभिमान तुम्ही हो, माँ रेवा

निश्छल निर्मल कल कल बहती
नित सूरज के ताप को सहती
पूजा भक्ति ध्यान तुम्ही हो, माँ रेवा…

अमरकंट से हो के प्रवाहित
सारी सभ्यता खुद में समाहित
मध्य प्रदेश का मान तुम्ही हो, माँ रेवा…

कंकर कंकर में शिव दर्शन
सौम्य स्वरूपा शांत प्रदर्शन
सरगम की हर तान तुम्ही हो, माँ रेवा…

विंध्य - सतपुड़ा का है आँचल
तुझमे मिलती नदियाँ चंचल
मेकल का बखान तुम्ही हो, माँ रेवा…

-अमित भटोरे
खरगोन

तमरा खोबजs ठाट छे दाजी...

तमरा खोबजs ठाट छे दाजी
पलड़ा सी बड़ो बाट छे दाजी
कुर्सी पs बठी नs कम्मर मुडज
अपणी बैठक टाट छे दाजी
मॉल नमs उ माल नी मिलतो
गांव नs मs जो हाट छे दाजी
रावळया नs सरी नेता लगज
पाछला जलम का भाट छे दाजी
अब केखs कई कवां हम ‘’अमित’’
वात नs वोकी सई साट छे दाजी
...अमित

सच की राह पे चलते रहते...

सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
खुद कांधों पर धरे हुए हम औरों का अभिशाप लिए
जीवन-मृत्यु के बंधन हम खुद ही कैसे खोल सकेंगे
सत्य न्याय के निर्णय को हम झूठा कैसे बोल सकेंगे
झूठे वादे झूठी आशा लेकर जीते है संताप लिए
सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
स्वप्न अधूरे पूरे होंगे धैर्य धरेंगे कब तक हम
मृग जैसे ही भटक रहे है कस्तूरी के लिए कदम
आशाओं के गीत गा रहे अब भी हम विलाप लिए
सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
..अमित

रडतs-रडतs गाई रयो केऊँ...

रडतs-रडतs गाई रयो केऊँ
बीज बबूल का वाई रयो केऊँ
झूटा नs की सेरी मs सी
निकळई न तू जाई रयो केऊँ
दाळ मइंगी छे तो चटनी वाट
उधारी माथा खाई रयो केऊँ
सबसी मिट्ठो मिट्ठो बोल
लीम का पत्ता चाई रयो केऊँ
गाय-बइल छे अपणी पईचाण
ट्रैक्टर-थ्रेशर लाई रयो केऊँ
...अमित

मांझी मझधार में हार गया क्यों...

सिस्टम जीते जी मार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
चलता कांधों पर लाश लिए
मन में पीड़ा के पाश लिए
सब मर्यादा को तार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
बेटी को क्या वो बतलाता
कैसे उसका मन बहलाता
अधिकारी फटकार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
मज़बूरी में क्या न करता
हर पल वो घुट घुट के मरता
कम्बल में पैर पसार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यो
...अमित

जमाना की वात मs आवजे मत...

जमाना की वात मs आवजे मत
भित्तर की वात ढ़ेल तक लावजे मत।
बूढ़ा आड़ा नs को कईणो सुणजे
वात वात पs डोळा बतावजे मत
कुटुंब संगात प्रेम सी रहिजे
अल्लग् सी चुलो जाळावजे मत
सबसी सच्ची सच्ची कइजे
झूटा नs को साथ निभावजे मत
रुखा सूखा म ज़ सुख छे ''अमित''
सोन्ना का पाछ नींद उड़ावजे मत
...अमित

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना...

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना
आकर किसका मन बहलाना
जब चाहत थी तब मिल न सके
क्यों घाव दिलों के सिल न सके
फिर राह तुम्हारी क्यों जाना
अब गीत तुम्हारें...

संसार को जीता करते थे
हर बात पे जीते मरते थे
दिल हार के किसको दिखलाना
अब गीत तुम्हारें...

तुम भूल गई वो किस्सा था
जीवन भर का एक हिस्सा था

वो पल भी कहाँ से अब लाना
अब गीत तुम्हारें...

कहने को तो वो बातें थी
आँखों में कटी वो रातें थी
पाया ही क्या था जो बिसराना
अब गीत तुम्हारें...

...अमित

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना...

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना
आकर किसका मन बहलाना
जब चाहत थी तब मिल न सके
क्यों घाव दिलों के सिल न सके
फिर राह तुम्हारी क्यों जाना
अब गीत तुम्हारें...

संसार को जीता करते थे
हर बात पे जीते मरते थे
दिल हार के किसको दिखलाना
अब गीत तुम्हारें...

तुम भूल गई वो किस्सा था
जीवन भर का एक हिस्सा था

वो पल भी कहाँ से अब लाना
अब गीत तुम्हारें...

कहने को तो वो बातें थी
आँखों में कटी वो रातें थी
पाया ही क्या था जो बिसराना
अब गीत तुम्हारें...

...अमित