Sunday, October 9, 2016

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना...

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना
आकर किसका मन बहलाना
जब चाहत थी तब मिल न सके
क्यों घाव दिलों के सिल न सके
फिर राह तुम्हारी क्यों जाना
अब गीत तुम्हारें...

संसार को जीता करते थे
हर बात पे जीते मरते थे
दिल हार के किसको दिखलाना
अब गीत तुम्हारें...

तुम भूल गई वो किस्सा था
जीवन भर का एक हिस्सा था

वो पल भी कहाँ से अब लाना
अब गीत तुम्हारें...

कहने को तो वो बातें थी
आँखों में कटी वो रातें थी
पाया ही क्या था जो बिसराना
अब गीत तुम्हारें...

...अमित

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