Wednesday, November 30, 2016

हाथ थाम संभलते रहना...


कांटो वाली राहों में भी साथ में मिलकर चलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

मिट्टी वाली गुल्लक में उम्मीदें गिन गिन डाली थी
दीपक से रोशन की थी जो रात अमावस काली थी
चाहे दिन हो या रातों में सुखद स्वप्न से पलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

पथरीली पगडण्डी से चलकर महानगर की गलियों तक
तितली जैसे भटक के पहुँची काँटों वाली कलियों तक
दीवाली में दीप जला होली के रंग तू
मलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

Sunday, November 27, 2016

जुगनुओं को देख उड़ने का हौसला भर ले
अंधेरों में ही सही तू लो की बातें कर ले

तपती रेत में बढ़ता चल पैरों छाले न देख
ऊँटों की तरह सेहरा से मुलाकातें कर ले

आसमान को देख आशाओं से जी भरके
चाँद सितारों के साथ ख़ुशी रातें कर ले

पतझड़ में पहाड़-नदियों की आस बंधने दे
सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले

जो नहीं मिला वो जरूर मिल जायेगा अमित
अभी जो है उन्ही के साथ सौगातें कर ले

...अमित

Friday, November 4, 2016

चंदन तरु पर विषधर अपना...

सुंदरता को देख तुम्हारी दर्पण का मन डोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना जैसे फन खोल रहा है

अभिलाषा लेकर मिलने की रात कट रही आँखों में
शब्द सलोने निकल रहे है हरदम उनकी बातों में
भोर के पहले बार बार क्यों दिल अपना टटोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना...

व्यस्तता ऐसी भी क्या एक बार भी मिलने आ न सको
साथ बैठकर कुछ पल तुम दो गीत प्रीत के गा न सको
मधुर प्रेम के रिश्तों को क्यों आडम्बर में तोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना...