Wednesday, November 30, 2016

हाथ थाम संभलते रहना...


कांटो वाली राहों में भी साथ में मिलकर चलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

मिट्टी वाली गुल्लक में उम्मीदें गिन गिन डाली थी
दीपक से रोशन की थी जो रात अमावस काली थी
चाहे दिन हो या रातों में सुखद स्वप्न से पलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

पथरीली पगडण्डी से चलकर महानगर की गलियों तक
तितली जैसे भटक के पहुँची काँटों वाली कलियों तक
दीवाली में दीप जला होली के रंग तू
मलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

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