Monday, September 18, 2017
दो नयन फिर सजल हो जाएंगे
दो नयन फिर सजल हो जाएंगे
आखरों से मिल ग़ज़ल हो जाएंगे
खंडहर बनकर जो जर्जर हो रहे
तुमसे मिलते ही महल हो जाएंगे
लफ्ज जो अधरों से न निकले कभी
एहसास पाकर वो कंवल हो जाएंगे
कत्ल करने ख्वाहिशों का आएंगे
साथ पाकर वो फजल हो जाएंगे
आज ही संभाल कर रख लो मुझे
भूल जाओगे गर जो कल हो जाएंगे
...अमित
आखरों से मिल ग़ज़ल हो जाएंगे
खंडहर बनकर जो जर्जर हो रहे
तुमसे मिलते ही महल हो जाएंगे
लफ्ज जो अधरों से न निकले कभी
एहसास पाकर वो कंवल हो जाएंगे
कत्ल करने ख्वाहिशों का आएंगे
साथ पाकर वो फजल हो जाएंगे
आज ही संभाल कर रख लो मुझे
भूल जाओगे गर जो कल हो जाएंगे
...अमित
डूब जाएगा घर आँगन सब
उम्मीदों की न बारिश होगी, खेत न अबके लहराएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब जलराशि में बह जाएंगे
डूबेगा हर गली मोहल्ला, जिसमें बीता था बचपन
छत बचेगी और न ताखा, जिसमें रखते थे दरपन
बरगद पर सावन के झूले अबके नहीं नजर आएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
चौपालें सूनी सी होगी, नहीं दिखाई देंगे मेले
हँसी ठिठोली जहां होती थीे, बच्चों के खो गए रेले
पेड़ की छांव वाले आँगन में अबके, लोरी कैसे सुनाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
खुशियां लेकर जन्मी बिटिया, परणी जब आंखें भर आई
जिस आँगन में मंडप बांधा, दरवाजे पर बजी शहनाई
ब्याही बेटी के जैसे, घर वापस लौट न पाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
डूब जाएगा घर आँगन सब जलराशि में बह जाएंगे
डूबेगा हर गली मोहल्ला, जिसमें बीता था बचपन
छत बचेगी और न ताखा, जिसमें रखते थे दरपन
बरगद पर सावन के झूले अबके नहीं नजर आएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
चौपालें सूनी सी होगी, नहीं दिखाई देंगे मेले
हँसी ठिठोली जहां होती थीे, बच्चों के खो गए रेले
पेड़ की छांव वाले आँगन में अबके, लोरी कैसे सुनाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
खुशियां लेकर जन्मी बिटिया, परणी जब आंखें भर आई
जिस आँगन में मंडप बांधा, दरवाजे पर बजी शहनाई
ब्याही बेटी के जैसे, घर वापस लौट न पाएंगे
डूब जाएगा घर आँगन सब...
दिया सा रात भर जलता रहा है
दिया सा रात भर जलता रहा है
पतंगों की तरह मचलता रहा है
ख्वाहिशें अधूरी अधूरी सी रही
ख़्वाब आंखों में पलता रहा है
हाथों में अब कुछ भी नहीं
समय रेत सा निकलता रहा है
पथरीली राह से पगडंडियों तक
बार बार गिरके संभलता रहा है
जमना तो बदनाम करता रहेगा
कीचड़ में कंवल सा खिलता रहा है
✍ अमित
पतंगों की तरह मचलता रहा है
ख्वाहिशें अधूरी अधूरी सी रही
ख़्वाब आंखों में पलता रहा है
हाथों में अब कुछ भी नहीं
समय रेत सा निकलता रहा है
पथरीली राह से पगडंडियों तक
बार बार गिरके संभलता रहा है
जमना तो बदनाम करता रहेगा
कीचड़ में कंवल सा खिलता रहा है
✍ अमित
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