Sunday, January 17, 2016

सियासत बदलते ही समझदार हो गए...

विरोधी ही दुश्मन के तरफदार हो गए
सियासत बदलते ही समझदार हो गए

भूली बिसरी यादों से क्यूँ मिला दिया
उम्मीदों हम फिर तेरे कर्जदार हो गए

खंजर लेकर चले थे गुनाहों के लिए
हकीकत समझते ही वफादार हो गए

रातभर देखा भूख से करवटें बदलते
मज़बूरी में कई बच्चे रोजदार हो गए

………………………….……….......
उन्हीं की नजरों में गुनहगार हो गए

...अमित

Thursday, January 14, 2016

अँधेरे उजाला देख मुँह मोड़ने लगे...

सारे तारे ओझल हो साथ छोड़ने लगे
ये अँधेरे उजाला देख मुँह मोड़ने लगे

साथ साथ चलती रही खुशबू फूलों की
फिर लोग क्यों डालियों को तोड़ने लगे

पतझड़ में छोड़ निकले थे जो आशिया
बसंत में पंछी फिर तिनके जोड़ने लगे

...अमित

सब कुछ मिले नए साल में...

नए साल की शुरुआत में...

गुजर गए काफिले गए साल में
अब सब कुछ मिले नए साल में

रौनकें उजड़ गई जहां अरसे से
खुशियों के गुल खिले नए साल में

टूटकर बिखरकर जो हुए जार जार
जज़्बातों से रिश्ते सिले नए साल में

खंडहरों में बदलकर न हुए आबाद
विचारों से सजे वो किले नए साल में

अस्तित्व अपना बनाने में लग चुके
इस बार बनेंगे वो जिले नए साल में

...अमित

दिल में दर्द के कई समंदर है...

चारों और ख़ौफ़ के मंजर है
अपनों के हाथों में खंजर है

बारिश निगल गई फसलें
तालाब किनारे खेत बंजर है

शराफत दिखाकर छल रहे
बेईमानी दिलों के अंदर है

सूख रही ख्वाहिशों की नदी
दिल में दर्द के कई समंदर है

...अमित

जब दवाएं ही मर्ज निकली...

ख्वाहिशें खुदगर्ज निकली
चांदनी रातें सर्द निकली
मिलता कैसे चेन दिन रात
जब दवाएं ही मर्ज निकली
...अमित