विरोधी ही दुश्मन के तरफदार हो गए
सियासत बदलते ही समझदार हो गए
भूली बिसरी यादों से क्यूँ मिला दिया
उम्मीदों हम फिर तेरे कर्जदार हो गए
खंजर लेकर चले थे गुनाहों के लिए
हकीकत समझते ही वफादार हो गए
रातभर देखा भूख से करवटें बदलते
मज़बूरी में कई बच्चे रोजदार हो गए
………………………….……….......
उन्हीं की नजरों में गुनहगार हो गए
...अमित
सियासत बदलते ही समझदार हो गए
भूली बिसरी यादों से क्यूँ मिला दिया
उम्मीदों हम फिर तेरे कर्जदार हो गए
खंजर लेकर चले थे गुनाहों के लिए
हकीकत समझते ही वफादार हो गए
रातभर देखा भूख से करवटें बदलते
मज़बूरी में कई बच्चे रोजदार हो गए
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उन्हीं की नजरों में गुनहगार हो गए
...अमित
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