चारों और ख़ौफ़ के मंजर है
अपनों के हाथों में खंजर है
बारिश निगल गई फसलें
तालाब किनारे खेत बंजर है
शराफत दिखाकर छल रहे
बेईमानी दिलों के अंदर है
सूख रही ख्वाहिशों की नदी
दिल में दर्द के कई समंदर है
...अमित
अपनों के हाथों में खंजर है
बारिश निगल गई फसलें
तालाब किनारे खेत बंजर है
शराफत दिखाकर छल रहे
बेईमानी दिलों के अंदर है
सूख रही ख्वाहिशों की नदी
दिल में दर्द के कई समंदर है
...अमित
No comments:
Post a Comment