Tuesday, December 1, 2015

आग के दरिया से गुजर जाऊं क्या...

आग के दरिया से गुजर जाऊं क्या
भरोसा न करो तो मर जाऊं क्या

समेट ले अपने पहलु में जज़्बात मेरे
रेत की तरह हाथों से बिखर जाऊं क्या

तुम साथ न आओ तो कहाँ जाए अब
बिन पतवार समंदर में उतर जाऊं क्या

सामने होकर भी नजर नहीं मिलाते
वख्त के टूटे आइनों में सवर जाऊं क्या

यादें फिर हक़ीक़त में बदलने के लिए
तुम कहो तो यहीं ठहर जाऊं क्या

...अमित

Wednesday, November 25, 2015

आज फिर दामन में वो दीपक सिराने आ गए






























थम चुकी खामोश लहरों को हिलाने आ गए
आज फिर दामन में वो दीपक सिराने आ गए
देखकर अंजान बन मिलने से जो बचते रहे
मशहूर होते ही वो अब रिश्ते निभाने आ गए
चार दिन बनते रहे जो शौकतों में रहनुमा
ख़त्म जब दौलत हुई तो दिन ठिकाने आ गए
सुबह से शाम तक यादों में वो आते रहे
रातों में भी अब वो ख्वाबों के बहाने आ गए
काम करके देर तक जब लौट आए घर तलक
बाजार में बनकर खबर फिर आजमाने आ गए
...अमित

Friday, November 13, 2015

कुछ पल साथ बिताओ भी...

कभी भूले भटके आओ भी
कुछ पल साथ बिताओ भी

व्यस्तता से समय निकालो
दिल से रिश्ते निभाओ भी

मन निर्बल हो जब रातों में
कुछ अपने दर्द दिखाओ भी

नादानी में सब खो न देना
कभी पाने में वक्त लगाओ भी

औरों को हँसना सिखलाते
कभी खुद का मन बहलाओ भी

...अमित

Sunday, November 8, 2015

उजालों के इंतजार में आँखें नम है...

जो साथ न आया उसका भी गम है
उजालों के इंतजार में आँखें नम है
दिल के दायरे में समाती नहीं ख्वाहिशें
ख़्वाब तो बहुत है मगर रातें कम है
दौराहों पर आकर सिमटती है मंजिलें
लड़खड़ाकर ही क्यों संभलते कदम है
मिलने से रोकने की करते रहे कोशिशें
सहारे के नाम पर आकर ढहाते सितम है
चेहरे को देखकर मिलाते नहीं नजरें
आइनों को देखकर वो संवारतें भरम है
...अमित

Saturday, October 31, 2015

कुछ देर सिकंदर हो जाए...

नई पुरानी यादों को भूल कलंदर हो जाए
नदियों के साथ बहकर अब समंदर हो जाए

सवाल है कई जो जवाब ढूंढ्ते फिर रहे
दफन कर दो इससे पहले की बवंडर हो जाए

आँखें बंद करके फिर नया ख्वाब सजा लो
नींद में ही सही कुछ देर सिकंदर हो जाए

इंतजाम कर के रखो सल्तनत बचाने का
ऐसा न हो की दुश्मन किले के अंदर हो जाए

ख्वाहिशों के गुलदानों को फिर सजाओ अमित
नादानियों से फिर गुलिस्ता न बंजर हो जाए

...अमित

Thursday, October 1, 2015

फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई...


अँधेरी गलियों में तन्हा चलते रहे बेइंतहा
मिला साथ मंजिल नजर आने लग गई

गुमनाम भटकते रहे बरसों बरस जो खत
डाकिये को उम्मीदें पता बताने लग गई

थपेड़ों से बार बार लड़ती रही पतवार
कश्ती को किनारे हवा लगाने लग गई

सर्द रातों में ठिठुरते बदलते रहे करवटें
तेरे एहसासों की पश्मीना सुलाने लग गई

बहार लाने बंजर जमीं पर बहाया पसीना
जमकर हुई बारिश फूल खिलाने लग गई

कई बाजी हारकर भी नहीं हारी हिम्मत
नई कोशिशें खिताब जिताने लग गई

कोरे कागजों में लिखते रहे प्यार अमित
फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई

...अमित

सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले...

जुगनुओं को देख उड़ने का हौसला भर ले
अंधेरों में ही सही तू लो की बातें कर ले

तपती रेत में बढ़ता चल पैरों छाले न देख
ऊँटों की तरह सेहरा से मुलाकातें कर ले

आसमान को देख आशाओं से जी भरके
चाँद सितारों के साथ ख़ुशी रातें कर ले

पतझड़ में पहाड़-नदियों की आस बंधने दे
सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले

जो नहीं मिला वो जरूर मिल जायेगा अमित
अभी जो है उन्ही के साथ सौगातें कर ले

...अमित

Sunday, September 20, 2015

बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है...

बहाकर नदियों को समंदर से मिला दो
बाँधों में घिरने की निराशा बहुत है
लहलहायेगी फसलें जरूर इस बार
बीजों को बारिश से आशा बहुत है
बादलों को देखकर मदमस्त है मोर
बूंदों के एहसास का प्यासा बहुत है
टूटकर बिखरकर ले रहे आकर
चोटों ने पत्थर को तराशा बहुत है
आईने बदलते नहीं चेहरे की रंगत
खुद को देखने की परिभाषा बहुत है
संवेदनाओं को बहने से कैसे रोके
मदद के नाम पर तमाशा बहुत है
तुमसे मिलकर और क्या बोले अमित
आँखों से आँखों की भाषा बहुत है
...अमित

Sunday, September 6, 2015

फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई...



अँधेरी गलियों में तन्हा चलते रहे बेइंतहा
मिला साथ मंजिल नजर आने लग गई


गुमनाम भटकते रहे बरसों बरस जो खत
डाकिये को उम्मीदें पता बताने लग गई


थपेड़ों से बार बार लड़ती रही पतवार
कश्ती को किनारे हवा लगाने लग गई


सर्द रातों में ठिठुरते बदलते रहे करवटें
तेरे एहसासों की पश्मीना सुलाने लग गई


बहार लाने बंजर जमीं पर बहाया पसीना
जमकर हुई बारिश फूल खिलाने लग गई


कई बाजी हारकर भी नहीं हारी हिम्मत
नई कोशिशें खिताब जिताने लग गई


कोरे कागजों में लिखते रहे प्यार अमित
फिर एक नई गज़ल गुनगुनाने लग गई

...अमित

Tuesday, September 1, 2015

सोशल मीडिया पर इनके भाव देखिये

प्याज में तुल रहे रिश्ते आज देखिये
सोशल मीडिया पर इनके भाव देखिये
फर्जी आईडी बनाकर करते है चैट
युवाओं में संस्कारों का भटकाव देखिये
दुर्भावना में करते है कमेंट और पोस्ट
उन्माद के लिए अधर्मियों के दांव देखिये
स्टेटस बदलकर ले रहे मौसम का मजा
एंटीसोशलवाद का बढ़ता घाव देखिये
आइनों की सच्चाई को झुठला रहे अमित
फ़ोटो को एडिट कर मूछों के ताव देखिये

Saturday, August 29, 2015

कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब...

कौन हिला पायेगा बुनियाद हमारी
मेहनत के पत्थर जो डाले है साहब
फरेब से सल्तनत बनाई थी जिन्होंने
अब उनकी हवेलियों में ताले है साहब
देश को लूटने की तैयारी में है जालिम
अभी जिन्दा वतन के रखवाले है साहब
सरहदों पर कैसे रुकेंगे दहशत के मंजर
आस्तीन में सांप कई पाले है साहब
कैसे उड़ पाएंगे लंबी उड़ान वो परिंदे
जिनके पंख हवाओं के हवाले है साहब
तितलियों को उड़ने से रोको उस ओर
जिस ओर सियासत के जाले है साहब
कब तक डराएंगे रातों के अंधेरे अमित
कुछ लम्हों बाद सुबह के उजाले है साहब
...अमित

Thursday, August 27, 2015

गलतफहमियों के दरियां से उभरता कौन है...

बातों-बातों में वक्त गुजर ही गया
गम के आईनों से धूल हटाता कौन है

हर बार बेइंतहा चाहता रहा एक शख्स
यही जवाब न मिला की बेवफा कौन है

जो हुआ हर बार बस देखते ही रहे
मोड़ से गुजरकर पीछे देखता कौन है

मिटने लगे है तमाम लिखावटों के निशां
तुम्हारें नाम लिखे खतों को खोलता कौन है

तेरे एहसास की बारिश भिगोती रही हरदम
ठंडी पड़ गई आग को जलाता कौन है

हसरतों को पाने में डूबता रहा अमित
गलतफहमियों के दरियां से उभरता कौन है

....अमित

Thursday, August 6, 2015

नीर की आंखों में आकर, अब तो थोड़ा प्यार दो

















नीर की आंखों में आकर, अब तो थोड़ा प्यार दो
निलमेघ का रूप देकर, इनका अंधेरा तार दो
आकाश से प्रवाहित विनाश को विराम दो
बह रही संवेदना, धरा की ओर थोेड़ा ध्यान दो
...अमित

कोई वक्त के साथ बिछड़ता रहा...

वक्त नहीं मिला कभी मुझसेमैं हमेशा उसका इंतजार करता रहाबदलते रहे दिन महिने सालवो मृग मरीचिका सा छलता रहामिलते रहे हारकर तजुर्बें वक्त के साथफिर भी जीत की कामना करता रहाकोई साथ आया वक्त देखकरकोई वक्त के साथ बिछड़ता रहावक्त नहीं मिला कभी मुझसेमैं हमेशा उसका इंतजार करता रहा...अमित

Sunday, July 26, 2015

रूकना नहीं है जिंदगी...


















रूकना नहीं है जिंदगी,
थोड़ी दूर साथ चलकर तो देख
मंजिल नजर आए ना आए,
उम्मीद से कुछ कदम बढ़ाकर तो देख
थकने-डरने की बात न कर,
मेरी सांसों से सांसें जोड़कर देख
मिलेगी खुशियां जरूर हर मोड़ पर,
मेरे हाथों से हाथ मिलाकर तो देख
....अमित

Wednesday, July 22, 2015

जब साथ मिले तो बात बने...



















इस बारिश में तन भीगा, मन भी भीगे तो बात बने
अंतरमन में खुशियों का, अब स्वाद घुले तो बात बने
बरसेगी अमृत बन बूंदे, तब प्रकृति का एहसास मिले
रिश्तों के इस जीवन में, जब साथ मिले तो बात बने
....अमित

Thursday, June 4, 2015

इंतजार है उसका जो आबाद कर दे...


अब इंतजार है उसका जो आबाद कर दे

रोज-रोज की परेशानियों से आजाद कर दे

आधे-अधूरे जीवन को मुकम्मल आकार दे

खुद के साथ मिलाकर मुझे साकार कर दे

...अमित

Tuesday, May 26, 2015

वापस लौटना है तुझमें ऐ बचपन...


वापस लौटना है तुझमें ऐ बचपन
फिर उस पल का इंतजार है अब
शाखों से गिरकर संभलना है बचपन
तुम्हारें सहारे का इंतजार है अब
मिट्टी से खेलकर महकना है बचपन
फिर उस बारिश का इंतजार है अब
चलाएंगे कागज की नाव ऐ बचपन
ख्वाहिशों को तैरने का इंतजार है अब
...अमित

Monday, May 18, 2015

ऐ दफ्तर तुम कभी उदास मत रहना...

















मैं कुछ समय के लिए जा रहा हूं
ऐ मेरे दफ्तर तुम उदास मत रहना
जल्द फिर आऊंगा लौटकर
तब तक तुम निराश मत रहना
जब भी बुलाओगे वापस आ जाऊंगा
मुझे याद करना, इन अंधेरों से मत डरना
एक और जिंदगी है तुमसे जुदा भी
तुम मुझे अपने से अलग मत समझना
आधी जिंदगी गुजारना है तुम्हारे ही साथ
तुम कभी भी मुझसे नाराज मत रहना
ऐ दफ्तर तुम कभी उदास मत रहना                                
                                 ...अमित


Friday, May 1, 2015

मजदूर ही तो है हम...










मजदूर ही तो है हम
दूसरों के लिए चमक के आधार है हम
खुद से ही बेरूखी के शिकार है हम
मजदूर ही तो है हम
सुबह से देर रात तक दर-दर से दफ्तर तक 
धूप-छांव, सर्दी-बरसात, गर्मी का अहसास है हम
मजदूर ही तो है हम
अवकाश के नाम पर भी काम है हम
हां! खबरों की शक्ल में अखबार है हम
मजदूर ही तो है हम...

Wednesday, April 29, 2015

वो कच्चे मकान ही अच्छे थे...









वो कच्चे मकान ही अच्छे थे
जहां दरवाजे छोटे और लोग बड़े थे
सर झुकाकर चलते थे
बुजुर्गों का अदब करते थे
अब मकान बहुमंजिला हो गए
दरवाजे बड़े और लोग छोटे हो गए...
....अमित

Monday, April 27, 2015

मंजिले कई और भी है...

ख्वाहिशें अभी और भी है

उम्मीदें कई और भी है

आराम का वक्त नहीं राह में 

मंजिलें कई और भी है                         

                            ...अमित