Sunday, December 25, 2016

उनींदी आँखों में सुबह होने नहीं देता...

भार सपनों का रात भर सोने नहीं देता
उनींदी आँखों में सुबह होने नहीं देता

ख्वाब देखे थे जो वो नींद में ही टूट गए
सागर आँखों में है मगर रोने नहीं देता

निशां नजर नहीं आते कारवां को पता दे जो
वो आँधियों में भी घिर कर खोने नहीं देता

दाग कितने पैरहन में लिए फिरते है यहाँ सब
जेहन के दाग वो न जाने क्यों धोने नहीं देता

लाश जिंदगी की तैरती रहती है “अमित”
समंदर भी खुद के भीतर डुबोने नहीं देता

...अमित

Wednesday, November 30, 2016

हाथ थाम संभलते रहना...


कांटो वाली राहों में भी साथ में मिलकर चलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

मिट्टी वाली गुल्लक में उम्मीदें गिन गिन डाली थी
दीपक से रोशन की थी जो रात अमावस काली थी
चाहे दिन हो या रातों में सुखद स्वप्न से पलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

पथरीली पगडण्डी से चलकर महानगर की गलियों तक
तितली जैसे भटक के पहुँची काँटों वाली कलियों तक
दीवाली में दीप जला होली के रंग तू
मलते रहना
चोटिल पैर भले हो जाए हाथ थाम संभलते रहना

Sunday, November 27, 2016

जुगनुओं को देख उड़ने का हौसला भर ले
अंधेरों में ही सही तू लो की बातें कर ले

तपती रेत में बढ़ता चल पैरों छाले न देख
ऊँटों की तरह सेहरा से मुलाकातें कर ले

आसमान को देख आशाओं से जी भरके
चाँद सितारों के साथ ख़ुशी रातें कर ले

पतझड़ में पहाड़-नदियों की आस बंधने दे
सावन के साथ मिलकर बरसातें कर ले

जो नहीं मिला वो जरूर मिल जायेगा अमित
अभी जो है उन्ही के साथ सौगातें कर ले

...अमित

Friday, November 4, 2016

चंदन तरु पर विषधर अपना...

सुंदरता को देख तुम्हारी दर्पण का मन डोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना जैसे फन खोल रहा है

अभिलाषा लेकर मिलने की रात कट रही आँखों में
शब्द सलोने निकल रहे है हरदम उनकी बातों में
भोर के पहले बार बार क्यों दिल अपना टटोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना...

व्यस्तता ऐसी भी क्या एक बार भी मिलने आ न सको
साथ बैठकर कुछ पल तुम दो गीत प्रीत के गा न सको
मधुर प्रेम के रिश्तों को क्यों आडम्बर में तोल रहा है
चंदन तरु पर विषधर अपना...

Sunday, October 9, 2016

संस्कारों का गान तुम्ही हो, माँ रेवा...

संस्कारों का गान तुम्ही हो, माँ रेवा
जन जन का अभिमान तुम्ही हो, माँ रेवा

निश्छल निर्मल कल कल बहती
नित सूरज के ताप को सहती
पूजा भक्ति ध्यान तुम्ही हो, माँ रेवा…

अमरकंट से हो के प्रवाहित
सारी सभ्यता खुद में समाहित
मध्य प्रदेश का मान तुम्ही हो, माँ रेवा…

कंकर कंकर में शिव दर्शन
सौम्य स्वरूपा शांत प्रदर्शन
सरगम की हर तान तुम्ही हो, माँ रेवा…

विंध्य - सतपुड़ा का है आँचल
तुझमे मिलती नदियाँ चंचल
मेकल का बखान तुम्ही हो, माँ रेवा…

-अमित भटोरे
खरगोन

तमरा खोबजs ठाट छे दाजी...

तमरा खोबजs ठाट छे दाजी
पलड़ा सी बड़ो बाट छे दाजी
कुर्सी पs बठी नs कम्मर मुडज
अपणी बैठक टाट छे दाजी
मॉल नमs उ माल नी मिलतो
गांव नs मs जो हाट छे दाजी
रावळया नs सरी नेता लगज
पाछला जलम का भाट छे दाजी
अब केखs कई कवां हम ‘’अमित’’
वात नs वोकी सई साट छे दाजी
...अमित

सच की राह पे चलते रहते...

सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
खुद कांधों पर धरे हुए हम औरों का अभिशाप लिए
जीवन-मृत्यु के बंधन हम खुद ही कैसे खोल सकेंगे
सत्य न्याय के निर्णय को हम झूठा कैसे बोल सकेंगे
झूठे वादे झूठी आशा लेकर जीते है संताप लिए
सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
स्वप्न अधूरे पूरे होंगे धैर्य धरेंगे कब तक हम
मृग जैसे ही भटक रहे है कस्तूरी के लिए कदम
आशाओं के गीत गा रहे अब भी हम विलाप लिए
सच की राह पे चलते रहते नित सूरज का ताप लिए
..अमित

रडतs-रडतs गाई रयो केऊँ...

रडतs-रडतs गाई रयो केऊँ
बीज बबूल का वाई रयो केऊँ
झूटा नs की सेरी मs सी
निकळई न तू जाई रयो केऊँ
दाळ मइंगी छे तो चटनी वाट
उधारी माथा खाई रयो केऊँ
सबसी मिट्ठो मिट्ठो बोल
लीम का पत्ता चाई रयो केऊँ
गाय-बइल छे अपणी पईचाण
ट्रैक्टर-थ्रेशर लाई रयो केऊँ
...अमित

मांझी मझधार में हार गया क्यों...

सिस्टम जीते जी मार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
चलता कांधों पर लाश लिए
मन में पीड़ा के पाश लिए
सब मर्यादा को तार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
बेटी को क्या वो बतलाता
कैसे उसका मन बहलाता
अधिकारी फटकार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यों
मज़बूरी में क्या न करता
हर पल वो घुट घुट के मरता
कम्बल में पैर पसार गया क्यों
मांझी मझधार में हार गया क्यो
...अमित

जमाना की वात मs आवजे मत...

जमाना की वात मs आवजे मत
भित्तर की वात ढ़ेल तक लावजे मत।
बूढ़ा आड़ा नs को कईणो सुणजे
वात वात पs डोळा बतावजे मत
कुटुंब संगात प्रेम सी रहिजे
अल्लग् सी चुलो जाळावजे मत
सबसी सच्ची सच्ची कइजे
झूटा नs को साथ निभावजे मत
रुखा सूखा म ज़ सुख छे ''अमित''
सोन्ना का पाछ नींद उड़ावजे मत
...अमित

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना...

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना
आकर किसका मन बहलाना
जब चाहत थी तब मिल न सके
क्यों घाव दिलों के सिल न सके
फिर राह तुम्हारी क्यों जाना
अब गीत तुम्हारें...

संसार को जीता करते थे
हर बात पे जीते मरते थे
दिल हार के किसको दिखलाना
अब गीत तुम्हारें...

तुम भूल गई वो किस्सा था
जीवन भर का एक हिस्सा था

वो पल भी कहाँ से अब लाना
अब गीत तुम्हारें...

कहने को तो वो बातें थी
आँखों में कटी वो रातें थी
पाया ही क्या था जो बिसराना
अब गीत तुम्हारें...

...अमित

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना...

अब गीत तुम्हारें क्यों गाना
आकर किसका मन बहलाना
जब चाहत थी तब मिल न सके
क्यों घाव दिलों के सिल न सके
फिर राह तुम्हारी क्यों जाना
अब गीत तुम्हारें...

संसार को जीता करते थे
हर बात पे जीते मरते थे
दिल हार के किसको दिखलाना
अब गीत तुम्हारें...

तुम भूल गई वो किस्सा था
जीवन भर का एक हिस्सा था

वो पल भी कहाँ से अब लाना
अब गीत तुम्हारें...

कहने को तो वो बातें थी
आँखों में कटी वो रातें थी
पाया ही क्या था जो बिसराना
अब गीत तुम्हारें...

...अमित

Sunday, July 3, 2016

चंदन पर भी सर्प पले है...

आस्तीनों में ही साँप पले है
हाथी पोरस के साथ चले है

रातों में भी नींद कहां अब
दिनभर चलकर पैर जले है

हम ही कमतर क्यों लगते
सब कहते वो लोग भले है

जग को करते फिरते रोशन
दीपक जलकर हाथ मले है

'अमित' सब इतने क्यों डरते है
चंदन पर भी सर्प पले है

...अमित

Sunday, June 12, 2016

ग्रीष्मावकाश...

अब नहीं मिलता ग्रीष्मावकाश
वो दिन लौट आए फिर काश

दिनभर मिट्टी में खेलते रहते
एक सा दिखता ज़मी-आकाश

तनाव नहीं बेफिक्री का आलम
रोज खिलते खुशियों के पलाश

जब इम्तेहान का भी नहीं था डर
उन दिनों की फिर से है तलाश

खुद से भी नहीं मिल पाते अमित
कब छूटेंगे अनिश्चितता के पाश

...अमित

Wednesday, June 1, 2016

बहे ये अमृतमान...

कुंदा को निर्मल करे, मिलकर सब श्रमदान
कल-कल कर निर्मल बने, बहे ये अमृतमान


नवग्रह जिसके तीर पर, सुख का हो उद्भाव
एक ओर से हो अजान, सब में हो सद्भाव

सतपुड़ा से बह चली, होकर ये गतिमान
रेवा में जाकर मिले, सबका ये अभिमान

शहर साथ में हो चला, बदलेंगे हालात
सब मिलकर प्रयास करे, बन जायेगी बात

जीवनदायी ये सदा, सबका रखती ध्यान
कचरा इसमें डालकर, क्यों बनते अज्ञान

...अमित

Monday, April 25, 2016

नेह ह्रदय का घुलने दो...

ख्वाब कई पाले है मन में
नई नई आशा जीवन में
नेह ह्रदय का घुलने दो

हर मुश्किल टल जाएगी
हिम्मत भी बढ़ जाएगी
साथ में लेकर चलने दो

रिश्ते नाते प्रेम की बातें
खुशियों की हो बरसातें
जख्म दिलों के सिलने दो

हर दिन सुबह जुनून मिले
रात नींद में सुकून मिले
साँझ सुहानी ढलने दो

...अमित

Wednesday, April 13, 2016

कहते रहो सलाम मोहब्बत...

सुबह मोहब्बत-शाम मोहब्बत
रिश्तों का एक नाम मोहब्बत

समय तुम्हारे साथ नहीं जब
आएगी तब ये काम मोहब्बत

रोज-रोज की भाग-दौड़ में
जीवन का आराम मोहब्बत

द्वेष भुलाकर प्रीत कराती
खुशियों का पैगाम मोहब्बत

रोज लिखे कलाम मोहब्बत
कहते रहो सलाम मोहब्बत

...अमित

Saturday, April 9, 2016

अपने मन की प्यास बड़ी है...

अपने मन की प्यास बड़ी है
लेकिन उनकी आस बड़ी है
क्या दिखलाए अपनी खोली
कोठी उनके पास बड़ी है
दे दे कर थक गए आवेदन
लिस्ट पहले से खास बड़ी है
इम्तेहान कब होगा अपना
दुनियादारी की क्लास बड़ी है
ख़त्म नहीं होती ये मुश्किल
जिंदगी क्यों उदास बड़ी है
...अमित

खुशियां लिखकर तार करेंगे...

जीवन को आकार करेंगे
सुंदर सपने साकार करेंगे
दुनियादारी की गलियों में
संबंधों का व्यापार करेंगे
दूर देश अपनों को अबके
खुशियां लिखकर तार करेंगे
विपदाओं के इस दरिया को
हम सब मिलकर पार करेंगे
विपरीत हवाओं के आगे
हौंसलों को पतवार करेंगे
...अमित

तम को हम तारे सदा ऐसा दान दो माँ सरस्वती
चलते रहे सदा सत्य पथ ऐसा भान दो माँ सरस्वती
रखे ह्रदय में दया धरम सभी एक साथ बढ़े चले
रहे दीन किंतु दुखी नहीं ये सम्मान दो माँ सरस्वती 
...अमित

सतपुड़ा का आँचल...

हर वसंत में याद तुम्हारी साथ हमारे चलती है
दिल में अरमानों के साथ खुशियाँ लाखों पलती है

सतपुड़ा का ये आँचल नित नए गीत सुनाता है
टेसू के फूलों के संग सुंदरता रंग बदलती है

साथ राह में बहते झरने निर्मल-पावन लगते है
पेड़-पहाड़ों के काँधों से साँझ सुहानी ढलती है

दिन ढलने के साथ समय की मोहलत और बढ़ती है
महुवा फुले पेड़ों से मदमाती सांस मचलती है

सुंदर सरसो के खेतों में अम्बुवा मोर बौराते है
सतपुड़ा के अंचल में तन्हाई हाथ मलती है

...अमित

Saturday, February 6, 2016

ख्वाब नया कोई पलने दे...

पथ पर आगे चलने दे
ख्वाब नया कोई पलने दे

नीरसता के तम को मिटा
दीप नया एक जलने दे

द्वेष भूलकर प्रीत निभा
पेड़ प्रेम का फलने दे

बेरंगी जीवन के पथ पर
रंग आशाओं का घुलने दे 

अनिश्चितता के भेद भुला
खुद को खुद से मिलने दे

...अमित

Sunday, January 17, 2016

सियासत बदलते ही समझदार हो गए...

विरोधी ही दुश्मन के तरफदार हो गए
सियासत बदलते ही समझदार हो गए

भूली बिसरी यादों से क्यूँ मिला दिया
उम्मीदों हम फिर तेरे कर्जदार हो गए

खंजर लेकर चले थे गुनाहों के लिए
हकीकत समझते ही वफादार हो गए

रातभर देखा भूख से करवटें बदलते
मज़बूरी में कई बच्चे रोजदार हो गए

………………………….……….......
उन्हीं की नजरों में गुनहगार हो गए

...अमित

Thursday, January 14, 2016

अँधेरे उजाला देख मुँह मोड़ने लगे...

सारे तारे ओझल हो साथ छोड़ने लगे
ये अँधेरे उजाला देख मुँह मोड़ने लगे

साथ साथ चलती रही खुशबू फूलों की
फिर लोग क्यों डालियों को तोड़ने लगे

पतझड़ में छोड़ निकले थे जो आशिया
बसंत में पंछी फिर तिनके जोड़ने लगे

...अमित

सब कुछ मिले नए साल में...

नए साल की शुरुआत में...

गुजर गए काफिले गए साल में
अब सब कुछ मिले नए साल में

रौनकें उजड़ गई जहां अरसे से
खुशियों के गुल खिले नए साल में

टूटकर बिखरकर जो हुए जार जार
जज़्बातों से रिश्ते सिले नए साल में

खंडहरों में बदलकर न हुए आबाद
विचारों से सजे वो किले नए साल में

अस्तित्व अपना बनाने में लग चुके
इस बार बनेंगे वो जिले नए साल में

...अमित

दिल में दर्द के कई समंदर है...

चारों और ख़ौफ़ के मंजर है
अपनों के हाथों में खंजर है

बारिश निगल गई फसलें
तालाब किनारे खेत बंजर है

शराफत दिखाकर छल रहे
बेईमानी दिलों के अंदर है

सूख रही ख्वाहिशों की नदी
दिल में दर्द के कई समंदर है

...अमित

जब दवाएं ही मर्ज निकली...

ख्वाहिशें खुदगर्ज निकली
चांदनी रातें सर्द निकली
मिलता कैसे चेन दिन रात
जब दवाएं ही मर्ज निकली
...अमित